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Tuesday, 28 January 2025

गुजरात

 गुर्जर जाति के बसने के कारण ही गुजरात नाम पड़ा।

यह लेख मैंने कई पत्रिकाओं को भी भेजा है।
कितने गुजरात !!!
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पाकिस्तान के पंजाब में भी गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र को गुजरात कहा गया है,तो सहारनपुर में भी गुजरात है जो गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र है। तथा भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात राज्य विद्यमान हैं वहीं पश्चिम बंगाल में भी गुर्जरपुर बसा है।अनेक पुस्तकों में ग्वालियर को गुर्जरगढ़ लिखा है।कई ऐतिहासिक किलों को गुर्जर गढ़ लिखा गया है।
" गतो दशरथः स्वर्ग योनो गुरूतरो गुरूः "
“गुर्जरानीकनाशेन गुर्जरीकेशलुश्चनम ।
विहितं तडगणातडगनासिडगशतै रणै ।। "
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर कुछ विकृत मानसिकता के लोगों द्वारा यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि गुर्जर शब्द एक स्थान वाचक है ना कि जाति वाचक। उन्होंने भ्रामक प्रचार करने के असफल प्रयास किए।
सत्य परेशान हो सकता है परंतु पराजित नहीं।
मैं कुछ पुस्तकों, ग्रंथों, दस्तावेज़ आदि के साक्ष्य आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। जिनमें स्पष्ट तौर पर गुर्जर जाति के होने एवं इसी जाति के विद्यमान और शासित होने के कारण ही गुजरात आदि नाम अस्तित्व में आने के उल्लेख है।
सर्वविदित है कि अरब हमलावरो से लगभग 300 वर्षों तक हिन्दुस्तान को बचाये रखने वाले “गुर्जर प्रतिहार “ वंश के सम्राटों को विभिन्न समकालीन ग्रंथों, इतिहास की पुस्तकों,गज़ेटियर,शिलालेख व ताम्रपत्रों मे गुर्जर ही लिखा है।और गुर्जर जाति के बसे होने के कारण ही गुजरात,गुर्जर मण्डल, गुर्जरदेश, गुर्जरात्रा , गुर्जरराष्ट्रा , गुर्जरभूमि , गुजराँवाला, गुर्जरगढ़, गूजरखान , गुर्जरपुर ,गूजरडेरा , गुर्जर क़िला आदि नाम पड़े।
विभिन्न पुस्तकों ,दस्तावेज़ों ,अभिलेखों , ग्रंथों आदि में गुर्जर संबंधित दिए गए विवरण इस प्रकार है :-
(1) Gazetteer of the Bombay Presidency, Vol. 9 , Part 1.
इस गज़ेटियर के पेज नंबर 469 - 502 तक Appendix B. मे “The Gujar” अध्याय हैं। इस अध्याय में गुर्जर जाति के उत्पत्ति,शासक ,गोत्र, प्रवास का ज़िक्र है। साथ ही गुर्जर शब्द का अर्थ बताया गया है कि गुर्जर या गूजर एक जाति है। और गुर्जरों से ही राजपूत के कई वंश की उत्पत्ति है।
साथ ही बताया गया कि गुर्जरों की उपाधि “मिहिर “ भी है। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज (836-885 ई.) को गुर्जर या गूजर राजा बताया गया है। साथ ही लिखा है कि सहारनपुर में गुजरात है और पंजाब में भी गुजरात है और ग्वालियर में गुर्जर गढ़, पंजाब के गुजराँवाला आदि का वर्णन किया है।
(2) बॉम्बे गज़ेटियर - खंड -1 भाग -1 अध्याय 1 मे लिखा है कि प्राकृत भाषा में गुर्जरात्रा व संस्कृत भाषा में गुर्जराष्ट्रा शब्द को आधुनिक गुजरात के लिए प्रयोग किया गया है। गुर्जर जाति के यहाँ बसे होने के कारण ही इसका नाम गुजरात हुआ। यह गुर्जरों के देश के लिए भी प्रयोग किया गया है। संस्कृत पुस्तकों और शिलालेखों में गुर्जरमण्डल व गुर्जरदेश गुर्जरभूमि का प्रयोग गुर्जरों की भूमि के लिए ही प्रयोग किया जाता है।
(3) Imperial Gazetteer of India, Central India वर्ष 1908
पेज नंबर 18 में लिखा है कि पाँचवीं,छठी शताब्दी में मे गुर्जर (Gurjara) जाति ने मध्य एशिया से प्रवेश किया आठवीं शताब्दी तक गुर्जर जाति के राजपूताना और पश्चिमी हिस्से बसे होने के कारण गुजरात कहा जाने लगा।
बुंदेलखंड व मालवा के परिहार व परमार राजपूत भी गुर्जर वंश से है। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज 885 ई. में मृत्यू के बाद गुर्जर साम्राज्य बिखर गया।
(4) Saharanpur Gazetteer Vol. 2 , 1921
पेज नंबर 101 पर लिखा:- The Gurjaras are identical with the Gurjar, Gujar of the old days the ancestor of the modern parihar Rajput. Saharanpur was commonly known as Gujarat.
(5) Jalaun Gazetteer Vol. 25 , 1909
पेज नंबर 115 पर लिखा है कि 500 ई. में जब तोरमन और मिहिरकुल शासन कर रहे थे तब गुर्जर (Gurjar) आसपास के क्षेत्रों में आकर बस गये।
(6) The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Vol. 3 , 1916
पेज नंबर 166-75 तक गुर्जर जाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। जिसमें बताया गया है कि गुर्जरों के बसने के कारण ही गुजरात, गुजराँवाला, और ग्वालियर के गुर्जर गढ़ आदि का नामकरण इसी जाति के नाम पर हुआ। स्पष्ट किया गया कि Gujar or Gurjara शब्द गूजर जाति के लिए प्रयोग किये जाते है। जो पूरानी जाति है। इसी जाति के राजा मिहिरभोज (840-90) को गुर्जर प्रतिहार संबोधित किया तथा बताया कि प्रतिहार व परिहार भी गुर्जर जाति के लिए संबोधन किए जाते है। स्पष्ट किया है कि Partihara( Parihar) Clan of Gurjara Tribe of Cast and consequently known clan of Parihar Rajput is a branch of Gurjara or Gujar Stock.
(7) हिमाचल प्रदेश सरकार के Planning Department,Shimla,1710002 ने गुर्जरों पर एक सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण कर रिपोर्ट तैयार की,यह रिपोर्ट आज भी संबंधित विभाग के वेबसाइट पर उपलब्ध है। इसमें लिखा है कि गुर्जर एक लड़ाकू क्षत्रिय जाति है , गुर्जर की उपाधि मिहिर भी है।
गुर्जर,गुज्जर,गूजर का शाब्दिक अर्थ एक ही है। गुर्जर,गूजर जाति के लोगों के बसने के स्थान को गुजरात,गुजराँवाला,गुर्जरदेश आदि कहा गया है।
(😎 सिक्ख गुर्जरों पर UNESCO की Global Prayer Digest-2011 की रिपोर्ट में गुर्जरों को क्षत्रिय बता कर उत्पत्ति का भी विवरण दिया है। तथा यह भी बताया है कि गुजरात नामक स्थान का नामकरण गुर्जर जाति के बसने के कारण हुआ है।
(9) Linguistic Survey of India Vol. 9 , Indo - Aryan Family, Central Group,Part 4
पेज नंबर 8-16 पर “The Gurjara “ शीर्षक से गुर्जर जाति के बारे में बताया गया है कि गुर्जर या गुज्जर, गूजर शब्द गुर्जर जाति के लिए प्रयोग किये गये हैं। गुजरात, गुजराँवाला आदि स्थानों का नाम गुर्जर जाति के विध्यमान होने पर यह नामकरण हुआ। गुर्जर का शाब्दिक अर्थ शत्रु विनाशक बताया है। गुर्जरों को देश के विभिन्न हिस्सों में बसाया बताया। गुर्जर शासकों नागभट्ट, वत्सराज,,व्याग्रहामुख, कन्नौज के राजा मिहिरभोज (840-90) को गुर्जर जाति से बताया। गुर्जरों द्वारा गुर्जरी भाषा का विस्तृत विवरण दिया है। तथा प्रतिहार व परिहार एवं परमार को भी गुर्जर जाति का होना बताया है।
(10) Jat ,Gujar and Ahir ,
A Martial Race रिपोर्ट मे A H BIngley
लेखक ने पेज नंबर 7 पर , गुर्जर जाति के उत्पत्ति संबंधी विवरण दिए हैं। बताया कि गुर्जरों ने दक्षिण में सिन्धु घाटी में स्थापित होकर सौराष्ट्र बसाया जिसे तब गुजरात कहा जाने लगा। काबुल ,कंधार ,कश्मीर, उत्तरी पंजाब बसे गुर्जरों के स्थान को गुजराँवाला व गुजरात और गुर्जरदेश कहा गया।
(11) The Gurjara Pratihara and Their Times- लेखक VB Mishra पेज 2 पर लिखते हैं कि गु्र्जरात्रा की आधुनिक पहचान गुजरात है। गुरजरात्रा गुजरात के लिए प्रयोग नहीं किया गया बल्कि यह एक अवधि ( 8-12 शताब्दी) के लिए है , जब यहाँ गुर्जरों का राज था।
(12) The History of Gurjar Pratiharas - लेखक BN Puri ने प्रस्तावना में ही लिखा है कि कन्नौज के प्रतिहार मूल रूप से गुर्जर जाति से थे। उन्हें अनेक राजाओं ने गुर्जर कह कर संबोधित किया है। उनके द्वारा शासित प्रदेश को गुर्जरात्रा कहा गया तथा गुर्जरों के रहने के कारण ही गुजरात नाम पड़ा।
(13) The Poison In The Gift -लेखक-Gloria Goodwin Rahja ने पेज नंबर 1 पर लिखा है कि गुर्जर एक प्रमुख भूमिधारी जाति है। 19 वीं शती के ब्रिटिश रिकार्ड्स हमें बताते हैं कि सहारनपुर ज़िले के एक बड़े भूभाग को गुजरात कहते थे। क्योंकि यहाँ गुर्जर की बहुलता है। गंगोह,नकूड, रामपुर के परगना और मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के सीमावर्ती क्षेत्रों को भी गुजरात के नाम से पहचानते हैं।
(14 The Gujar Settlement -लेखक - DS Manku ने पेज नंबर 3और 4 पर लिखा है कि गुर्जर शब्द संस्कृत से बना है , गुर्जर एक जनजाति है जो माउंट आबू राजस्थान के आसपास रहने वाले लोगों से यह नाम उस भूमि पर स्थानांतरित कर दिया गया जहां वे पहले बसे थे। जिनका हम गुजरात,गुर्जरात्रा , गुर्जरभूमि से उल्लेख करते हैं। तथा पंजाब में गुजरात,गुजराँवाला,गूजरखान के नाम के साथ अभी भी गुर्जर जुड़ा है।
(15) Developing Gujarat- लेखक- H R Patankar , Kirit Shelot (IAS) - इस पुस्तक का विमोचन तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय रूपानी ने किया। तथा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी इसमें शुभकामनां संदेश लिखा है। इस पुस्तक में लिखा है कि गुजरात का नाम यहाँ पर बसने वाली गुर्जर जाति के नाम पर पड़ा है। जो कालांतर में पंजाब से चलकर यहाँ आकर बस गई।
(16) History of Ancient India- लेखक- R S Chaurasiya पेज 206 पर लिखते हैं कि - : गुर्जर शब्द प्रतिहार के साथ संबंधित है जो मध्य एशिया की एक गुर्जर जाति है। लेकिन अनेक इतिहासकार इन्हें हिन्दुस्तान की गुर्जर जाति ही मानते हैं। ये लक्ष्मण के वंशज है। इस लिए इन्हें प्रतिहार कहा गया। गुर्जर जाति के नाम पर ही गुजरात नाम पड़ा।
जिन अन्य पुस्तकों व दस्तावेज़ों में गुर्जरों की उत्पत्ति,गुर्जर जाति व गुर्जर,गूजर,गुज्जर शब्द का एक ही अर्थ है। तथा गुर्जर जाति के शासकों के वर्णन है। व गुर्जर जाति के बसने के कारण ही गुजरात व गुजराँवाला जैसे अनेकों स्थानों के नाम पड़े उनका विवरण इस प्रकार है।
1. भारत का इतिहास- लेखक- डा. गोपाल प्रसाद, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी
2. Ashort History of India:- (W H Moreland) pg no. 114
3. Cambridge History of India:-(Allan J ) pg 104.
4. Comprehensive History of India,part 1. Pg 49 & 141.
5. Early History of India, 4th Edition:-(V A Smith) pg 4-5 , 427-28
6. Al-Hind :-(Andre Wink) pg 277-303.
7. The Gurjara Pratihar and Their Times:-(V B Mishra) pg 29
8. History of India part 1 :- (R D Mukharji) pg 140-41.
9. D R Bhandarkar Volume. Edited by Bimla Churn Law.
10. Ancient India and South Indian History & Culture. :-(Dr. S Krishanasvami Aiyangar) pg 326-370
11. Indian Village Community:-(B H Baden -Powell)pg 101-102.
12. मध्य क़ालीन भारत:-( हरिश्चंद्र वर्मा) पेज 5-17
13. भारत का इतिहास- लेखक- को. अ. अतोनोवा , ग्रि. ग्रि. कोतोव्सकी , ग्रि. म. बोगर्द
14. History of Kanauj :- R S Tripathi) ph 78, 110,191,221-22,226-27,241,267,271,274.
15. जाति व्यवस्था:-(सच्चिदानन्द सिन्हा) पेज 84-85
16. प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत का इतिहास। :- डा. कमल भारद्वाज।
17. जाति व्यवस्था:( नर्मदेशवर प्रसाद) पेज 43,74,75
18. प्राचीन भारत का इतिहास- लेखक- पुरुषोत्तम लाल भार्गव, अध्यक्ष संस्कृत विभाग, जयपुर यूनिवर्सिटी।
19. The Art under The Gurjar Pratihar- लेखक- ब्रिजेश कृष्ण
20. भारतीय इतिहास का पूर्व मध्य युग- लेखक- सत्यकेतु विद्यालंकार
21. Origin and History Of Jats & Other Allied Nomadic Tribes of India- लेखक B S Nijjar
22. Martial Races of Undivided India- लेखक- V P Tyagi
23. Interpreting Medieval India - लेखक- विपुल सिंह
24. देवनारायण बगडावत महागाथा-लेखक - लक्ष्मी कुमारी चुंडावत (पद्मश्री, सांसद 1962-79) लेखिका राजपूत जाति और राजघराने से संबंध रखती है। इन्होंने इस पुस्तक में बगडावत चौहान को गुर्जर लिखा है तथा बताया है कि गुर्जर जाति के बसे होने के कारण गुजरात , गुजराँवाला नाम पड़े हैं।
25. गुजरात सरकार की सरकारी वेबसाइट CMOgujrat .gov.in तथा dgfasli.gov.in पर स्पष्ट लिखा है कि गुजरात का नाम गुर्जर जाति के के बसे होने के कारण पड़ा। यहाँ बहुतायत में गुर्जर लोग बसे होने पर ही इस राज्य का नाम गुजरात पड़ा।
26. विदेशी यायावर इतिहासकारों के विवरण :- अरब यात्रियों सुलेमान, अलमसूदी इन्ने खुर्दाद, अबू जैदद , बालाघूरी आदि ने कन्नौज के गुर्जर सम्राटों क गुर्जर इसलिए कहा लिखा है कि ये गुर्जरजाति के सम्राट समस्त उत्तर भारत के सम्राट थे। और इनकी तत्कालीन राजधानी कन्नौज नगरी जो गुर्जर देश से बहुत दूर वर्तमान उत्तर प्रदेश में थी। प्रसिद्ध अरब इतिहासकार अलबरूनी ने वर्तमान राजपूताना में गुजरात का उल्लेख किया है।क्योंकि अलबरूनी (1024-40 ईस्वी) तक वर्तमान राजस्थान मुख्यतः गुर्जर देश या गुर्जरात्रा कहलाता था।
"
" शब्द कल्पद्रुम “ ग्रंथ मे गुर्जर शब्द की व्याख्या की है कि शत्रुओं के ताडन-मारण-विनाश से जो रक्षा करने वाले साहसी है वे गुर्जर कहलाते है ।
गुर्जर भारतवर्ष की अखंडता ओर सुरक्षा के लिये सदैव तत्पर रहे है।
आर्यावर्त अथवा अखंड भारत के भीतरी कलह को शांत करने ओर इसकी सीमाओं की रक्षा हेतु गुर्जरो का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।
“योग वशिष्ठ” के सर्ग 35 छंद 19 में
देवताओ ओर दैत्यों के आपसी कलह मे महाराजा दशरथ की ओर से दैत्यों के उधम को मिटाने मे वीरगति को प्राप्त होने वाले गुर्जरो की स्त्रियों का अपने केशों को लच्छन ( बाल कटवाना ) करवा कर शोक प्रकट करने का वर्णन मिलता
" गुर्जरानीकनाशेन गुर्जरीकेशलुश्चनम ।
विहितं तडगणातडगनासिडगशतै रणै ।। "
वाल्मीकि रामायण मे आया है ।
" गतो दशरथः स्वर्ग योनो गुरूतरो गुरूः "
अर्थात महाराजा दशरथ जो हम गुर्जरो मे महान थे स्वर्ग सिधार गये ।
पुरातत्ववेता पंडित छोटे लाल शर्मा ने भी अपनी पुस्तक “ क्षत्रिय
वंश प्रदीप “ के पृष्ठ - 812 पर यह वर्णन करते हुए लिखा है।
" आर्यो दवारा बडे से बडे व्यक्तियो बलवान से बलवान व्यक्तियो, गुरू से बडे व्यक्तियो के लिए "गुरूतर शब्द " प्रयुक्त किया जाता था । यही गुरूतर शब्द क्षत्रियो के लिए भी प्रयुक्त होता था ।
गुरूतर शब्द का अर्थ गुरु से अलग विशेषता - बलवान, वीर, चातुर्य, लडाकू आदि रखने वाला व्यक्ति है।
ये गुण क्षत्रियो मे होते थे तथा क्षत्रियो के लिए गुरूतर शब्द प्रयुक्त होता था ।
कालांतर मे यही गुरूतर शब्द ही गुर्जर शब्द बना ।
जिन लोगों को गुर्जर शब्द स्थान वाचक शब्द लगे जरा बाल्मीकि रामायण को आंखे खोल कर पढ़े गुर्जरों का इतिहास सब समझ आ जायेगा। ( पुरातत्व विशारद पंडित छोटेलाल शर्मा, क्षत्रिय वंश प्रदीप )
प्रमुख ताम्रपत्र में जिनमें गुर्जर जाति का विवरण है। संक्षेप में विवरण देता हूँ।
1. सज्जन ताम्रपत्र
2. बड़ौदा ताम्रपत्र
3. माने ताम्रपत्र
4. बामुग्रा ताम्रपत्र महिपाल (915) को दहाड़ता गुर्जर कहा है।
5. खजुराहो अभिलेख (925-50)यशोवर्मन को प्रतिहारों के लिए झंझावत व गुर्जरों के लिए अग्नि के समान बताया है।
शिलालेख
1. करडाह
2. राधनपुर
3. नीलगुण्ड
4. देवली
5. बादल स्तम्भ लेख के श्लोक नंबर 13 मे गुर्जर राजा, गुर्जर नाथ का वर्णन है।
6. सिरूर शिलालेख यह शिलालेख गोविन्दा -3 व गुर्जर नागभट्ट -2 के युद्ध का वर्णन है जिसमें नागभट्ट को गुर्जरान ,,गुर्जर राजा,गुर्जर सैनिक,गुर्जर जाति,गुर्जर राज्य का उल्लेख है।
राजौर के अभिलेखों में कन्नौज व उज्जैन के प्रतिहार को गुर्जर कहा है।
7. चन्देल शिलालेखों में गुर्जर प्रतिहार कहा है।
8. ऐहोल ,नवसारी शिलालेखों में इन्हें गुर्जेश्वर कहा है।
9. जोधपुर व घटियाला के शिलालेख से प्रकट होता है कि गुर्जर प्रतिहार का मूलस्थान गुर्जरात्र था।
10. राजौर के अभिलेख में कन्नौज व उज्जैन के प्रतिहार वंश को गुर्जर कहा है।
ग्रंथों में गुर्जर विवरण।
1. कवि पम्पा द्वारा लिखित “विक्रमार्जुन विजय” में तत्कालीन गुर्जर प्रतिहार सम्राट महिपाल (912-44) को गुर्जर राजा कहा है।
2. अरब यात्री अलमसूदी (915ई.) भारत यात्रा के दौरान सम्राट महिपाल के दरबार में रहा। उसने “मजरूल- जुहाब नामक ग्रंथ लिखा उसने महिपाल को वोरा व इस वंश को अल-जुर्ज (गुर्जर) कहा है।
3. कल्हण के बारहवीं सदी में लिखे ग्रंथ राजतरंगिणी प्रतिहार को गुर्जर कहा है।
4. स्कन्ध पुराण के प्रभास खंड में वर्णन है। मार्कण्डेय पुराण व पंचतंत्र में भी गुर्जर जन जाति के प्रमाण है।
5. हर्षचरित में लेखक बाण ने भी गुर्जर जाति का वर्णन किया है।
6. मार्कण्डेय पुराण व पंचतंत्र में भी गुर्जर जनजाति के प्रमाण है।

Sunday, 6 October 2024

गुर्जरदेश या राजपुताना

 उत्तर में सतलज से दक्षिण में नर्मदा तक के प्रदेश गुर्जरात्रा के अधीन थे।इसमें प्राचीन जांगल देश ,जांगल कूप,दुर्ग,नागौर ,शाकम्बरी ,पुष्कर,मंडोर, मरुदेश,वलमण्डल,माडा, मारवाड़,आबुमण्डल,वंसत गढ़,जालोर,भीनमाल,आनर्त,बड़नगर,खेड़ानगर(ब्रह्मखेड़ा)स्वभृघाटी,महीघाटी, अनुपप्रदेश, नर्मदाघाटी,लाट देश,ताप्ति घाटी ,सौराष्ट्र,काठियावाड़, कछ का रण आदि सम्मिलित थे।

इसी गुजरात्रा का दक्षिणी भाग कालांतर में गुर्जर मण्डल,गुर्जरदेश,गुर्जर भूमि,एवम अंत मे गुजरात कहलाया।
गुर्जरात्रा का उत्तरी भाग गुर्जरभूमि, गुर्जर मण्डल,एवम गुर्जरात्रा ही रहा।
गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के विखण्डन के बाद गुर्जरात्रा में अनेक छोटे छोटे प्रान्तों को लेकर अनेक राज्य स्थापित हुए तथा इस प्रदेश के छोटे छोटे प्रदेशो के अलग अलग नाम पड़े जैसे मारवाड़, मेदपाट(मेवाड़ा),बागड़, तथा भड़ानप्रदेश आदि।
इनके साथ कुछ प्राचीन नामो वाले प्रदेश जैसे जांगल देश,अनन्त देश,मत्स्य देश ,मरुदेश,वलमण्डल,माडा, अबुर्द देश ,पेरियात्र, मालवा, आदि प्राचीन नामो से ही गुर्जरात्रा के अंग बने रहे।
बी न पूरी ने हिस्ट्री ऑफ गुर्जर प्रतिहार में लिखा है गुर्जरात्रा का अर्थ गुर्जरो के अधीन प्रदेश से है।गुर्जर क्षत्रियो का निवास एवम राज्य प्रदेश ही गुर्जरात्रा कहलाया।
कर्नल टॉड ने गुर्जरात्रा का नाम रॉयस्थान (राजस्थान)दिया है।बाद में यही राजपुताना हो गया।
Km मुंशी ने मंडोर के गुर्जर राज्य एवम नान्दीपुर (भड़ौच)गुर्जर राज्य का भी ब्याख्यान किया है।

Friday, 27 September 2024

1857 की क्रांति में दादरी एवं सिकन्दराबाद के निकटवर्ती क्षेत्र

पुस्तक :- 1857 का विप्लव
रचनाकार : विघ्नेश कुमार, मुदित कुमार
प्रकाशन :-1857 पेट्रियोटिकल प्रेजेन्टेशन, पब्लिकेशन डिवीज़न
सूचना एवं प्रसार मंत्रालय, भारत सरकार
10 मई को मेरठ से शुरू हुआ विप्लव शीघ्र ही दादरी एवं सिकन्दराबाद क्षेत्र में फैल गया। दादरी एवं सिकन्दराबाद में गुर्जर क्रांतिकारियों ने सरकारी डाक बग़लों, तार घरों व इमारतों को ध्वस्त करना आरम्भ कर दिया। सरकारी संस्थानों को लूटकर उनमें आग लगा दी गई। इस प्रकार सिकन्दराबाद कस्बे के चारों और लूटपाट व आगज़नी की घटनाएँ घटित होने लगी। 15 मई को क्रांतिकारी सैनिकों की रेजिमेंट ने सिकन्दराबाद में पूर्व दिशा की ओर से प्रवेश करके पुलिस व्यवस्था को पूर्णतः नष्ट कर दिया। जो सैनिक तथा चपरासी उपखंड की सुरक्षा के लिए तैनात थे, वे सभी वहाँ से भाग गए।
दादरी में भी लूटपाट की अत्यधिक घटनाएँ हो रही थी। यद्यपि मि. टर्नबुल वहाँ शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से चले किन्तु रास्ते में बड़पुरा गाँव के निकट क्रांतिकारियों द्वारा उसे रोक दिया गया। 21 मई को दोपहर बुलन्दशहर के जिला मजिस्ट्रेट सैप्टे को दादरी के एक मुखाबिर ने सूचना दी कि 5 बजे शाम गुर्जरों एवं राजपूतों का आक्रमण होने वाला है। 4:30 पर उन्हें दूसरी सूचना मिली की अलीगढ़ से 9वीं पलटन के क्रांतिकारी सैनिक खुर्जा पहुँच गये हैं। इन खबरों को सुनकर मि. सैप्ट ने खजाने को मेरठ भेजने का विचार किया। उसने मि. रौस को गाड़ियों में खजाना रखने के लिए कहा लेकिन खजाने की चाबियाँ उस समय नहीं थी। इसलिए सन्दूकों को तोड़कर खजाने को सरकारी गाड़ियों में लाद दिया गया। इसके बाद टर्नबुल, मैल्विल, लॉयल कुछ घुड़सवारों के साथ आगे बढ़ना ही चाहते थे, परन्तु दादरी के निकटवर्ती क्षेत्र के गुर्जरों एवं राजपूतों के आक्रमण के कारण तथा 9वीं पल्टन के क्रांतिकारी सैनिकों के बुलन्दशहर आ जाने से, वे आगे नही बढ़ सके। इस समय एक क्रांतिकारी संतरी ने उन्हें सावधान करते हुए कहा कि 'सावधान! यदि कोई भी आगे बढ़ा तो गोली मार दी जायेगी।' यद्यपि ब्रितानियों ने क्रांतिकारियों का सामान किया और संघर्ष में कई क्रांतिकारी भी मारे गये लेकिन फिर भी क्रांतिकारियों ने खजाने को लूट लिया। जब लेफ्टिनेन्ट रौस ने अपने सैनिकों को कोषागार बचाने के लिए कहा तो उन्होंने आज्ञा मानने से इन्कार कर दिया और वे भी क्रांतिकारियों के साथ हो गये। इस समय बुलन्दशहर में तोड़-फोड़ की गयी तथा सभी प्रलेख खत्म कर दिये गये। क्रांतिकारी ग्रामीणों के आने से पहले की क्रांति से प्रभावित जेल प्रहरियों ने जेल का फाटक खोल दिया। जेल से निकले कैदियों ने भी विप्लव में भाग लिया। गुर्जरों एवं अन्य क्रांतिकारियों ने जिला अदालत में भी तोड़-फोड़ की और सभी कागजात जला डाले। क्रांति की इस भयावह स्थिति से आतंकित होकर अपने प्राण बचाने के लिए सभी अंग्रेज अधिकारी बुलन्दशहर छोड़कर 21 मई को सायं 6:30 बजे मेरठ की ओर भाग खड़े हुए। वे भाग कर 10 बजे रात्रि में हापुड़ पहुँचे और 22 मई को प्रातः 9 बजे जान बचाकर मेरठ आ गये। बुलन्दशहर से ब्रिटिश अधिकारियों के पलायन करने के पश्चात् वहाँ से ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया और मेरठ से आगरा तक का मार्ग क्रांतिकारियों के नियन्त्रण में आ गया। मेजर रीड के नेतृत्व में सिरमुर बटालियन जो नहर के मार्ग से कुछ दिन पहले बुलन्दशहर आने वाली थी, वह क्रांतिकारियों द्वारा नहर को क्षतिग्रस्त कर देने के कारण बहुत देर एवं कठिनाई से 24 मई को बुलन्दशहर पहुँची। देहरादून से गोरखा पल्टन की खबर सुनकर जिला मजिस्ट्रेट सैप्टे, लेफ्टिनेन्ट रौस, कैप्टन टर्नबुल तथा लॉयल 26 मई को बुलन्दशहर वापिस लौट आये।दादरी में भी लूटपाट की अत्यधिक घटनाएँ हो रही थी। यद्यपि मि. टर्नबुल वहाँ शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से चले किन्तु रास्ते में बड़पुरा गाँव के निकट क्रांतिकारियों द्वारा उसे रोक दिया गया। 21 मई को दोपहर बुलन्दशहर के जिला मजिस्ट्रेट सैप्टे को दादरी के एक मुखाबिर ने सूचना दी कि 5 बजे शाम गुर्जरों एवं राजपूतों का आक्रमण होने वाला है। 4:30 पर उन्हें दूसरी सूचना मिली की अलीगढ़ से 9वीं पलटन के क्रांतिकारी सैनिक खुर्जा पहुँच गये हैं। इन खबरों को सुनकर मि. सैप्ट ने खजाने को मेरठ भेजने का विचार किया। उसने मि. रौस को गाड़ियों में खजाना रखने के लिए कहा लेकिन खजाने की चाबियाँ उस समय नहीं थी। इसलिए सन्दूकों को तोड़कर खजाने को सरकारी गाड़ियों में लाद दिया गया। इसके बाद टर्नबुल, मैल्विल, लॉयल कुछ घुड़सवारों के साथ आगे बढ़ना ही चाहते थे, परन्तु दादरी के निकटवर्ती क्षेत्र के गुर्जरों एवं राजपूतों के आक्रमण के कारण तथा 9वीं पल्टन के क्रांतिकारी सैनिकों के बुलन्दशहर आ जाने से, वे आगे नही बढ़ सके। इस समय एक क्रांतिकारी संतरी ने उन्हें सावधान करते हुए कहा कि 'सावधान! यदि कोई भी आगे बढ़ा तो गोली मार दी जायेगी।' यद्यपि ब्रितानियों ने क्रांतिकारियों का सामान किया और संघर्ष में कई क्रांतिकारी भी मारे गये लेकिन फिर भी क्रांतिकारियों ने खजाने को लूट लिया। जब लेफ्टिनेन्ट रौस ने अपने सैनिकों को कोषागार बचाने के लिए कहा तो उन्होंने आज्ञा मानने से इन्कार कर दिया और वे भी क्रांतिकारियों के साथ हो गये। इस समय बुलन्दशहर में तोड़-फोड़ की गयी तथा सभी प्रलेख खत्म कर दिये गये। क्रांतिकारी ग्रामीणों के आने से पहले की क्रांति से प्रभावित जेल प्रहरियों ने जेल का फाटक खोल दिया। जेल से निकले कैदियों ने भी विप्लव में भाग लिया। गुर्जरों एवं अन्य क्रांतिकारियों ने जिला अदालत में भी तोड़-फोड़ की और सभी कागजात जला डाले। क्रांति की इस भयावह स्थिति से आतंकित होकर अपने प्राण बचाने के लिए सभी अंग्रेज अधिकारी बुलन्दशहर छोड़कर 21 मई को सायं 6:30 बजे मेरठ की ओर भाग खड़े हुए। वे भाग कर 10 बजे रात्रि में हापुड़ पहुँचे और 22 मई को प्रातः 9 बजे जान बचाकर मेरठ आ गये। बुलन्दशहर से ब्रिटिश अधिकारियों के पलायन करने के पश्चात् वहाँ से ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया और मेरठ से आगरा तक का मार्ग क्रांतिकारियों के नियन्त्रण में आ गया। मेजर रीड के नेतृत्व में सिरमुर बटालियन जो नहर के मार्ग से कुछ दिन पहले बुलन्दशहर आने वाली थी, वह क्रांतिकारियों द्वारा नहर को क्षतिग्रस्त कर देने के कारण बहुत देर एवं कठिनाई से 24 मई को बुलन्दशहर पहुँची। देहरादून से गोरखा पल्टन की खबर सुनकर जिला मजिस्ट्रेट सैप्टे, लेफ्टिनेन्ट रौस, कैप्टन टर्नबुल तथा लॉयल 26 मई को बुलन्दशहर वापिस लौट आये।
परन्तु इससे पूर्व 23 मई को महेशा, मनौरा और बेयर गाँव के 4-5 हजार ग्रामीण एकत्रित हुए तथा उन्होंने मिलकर सिकन्दराबाद पर आक्रमण करके खूब लूटमार की। इस लूटमार में करीब 70 लोग मारे गये।

दादरी क्षेत्र के गाँवों में कटहेड़ा गाँव के उमारव सिंह, बिलू गाँ के रूपराम, लाहरा खुगुआरा के सिब्बा एवं नयनसुख, नंगला के झण्डू, छतेहरा के फतेह गुर्जर, महेशा के बेबी सिंह जमींदार, बेयर के हरबोल, तिलबेगपुर के चौधरी पीर बख्श खाँ एवं धौला, किलौना, नंगला समाना व पारफा के ग्रामीणों ने क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भाग लिया।
कुछ समय बाद में बुलन्दशहर में ब्रितानियों की स्थिति धीरे-धीरे दृढ़ होती गई। उन्होंने सेना के उन अधिकांश सैनिकों को नौकरी से निकाल दिया जिन्होंने क्रांति में गुप्त रूप से या प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था। उनके स्थान पर निकटवर्ती गाँवों के जाटों को भर्ती किया गया क्योंकि उन्होंने ब्रितानियों के प्रति स्वामी-भक्ति प्रदर्शित की थी।
क्रांति की असफलता के पश्चात् ब्रितानियों ने दादरी परगने में दमनचक्र शरू किया। 26 सितम्बर को ग्रीथेड ने दादरी और आस-पास के गाँवों में आग लगवा दी। इस परगने के रोशन सिंह के पुत्रों एवं भाइयों को सरेआम फाँसी दे दी गयी और उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। कटहेड़ा के उमराव सिंह एवं सेढू सिंह भाटी को जिन्दा जमींन पर लिटा कर हाथी से कुचलवा दिया गया। दादरी के भगत सिंह एव बिसन सिंह को बुलन्दशहर में 'काला आम' (कत्लेआम) चौराहे, बुलन्दशहर पर फाँसी दे गयी। इस स्थान को वर्तमान में 'शहीद चौक' के नाम से जाना जाता है।

राजपूतों की उत्पत्ति

 ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन

👇
इसी करण कन्या को चारणों ने करणी माता के रूप में अपनी कुल देवी स्वीकार कर लिया है ।
जिसका विवरण हम आगे देंगे -
ज्वाला प्रसाद मिश्र ( मुरादावादी) 'ने अपने ग्रन्थ जातिभास्कर में पृष्ठ संख्या 197 पर राजपूतों की उत्पत्ति का हबाला देते हुए उद्धृत किया कि ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)
← अध्यायः१० ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
श्लोक संख्या १११
_______
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।।
1/10।।111
ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति
क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।
तथा स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26 में राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए कहा
" कि क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है ।👇
( स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26)
और ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति
क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।
आगरी संज्ञा पुं० [हिं० आगा] नमक बनानेवाला पुरुष ।
लोनिया
ये बंजारे हैं ।
प्राचीन क्षत्रिय पर्याय वाची शब्दों में राजपूत ( राजपुत्र) शब्द नहीं है ।
विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा
दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं
और रही बात राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।
चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में वर्णन है।👇
< ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)
← ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
अध्यायः १० श्लोक संख्या १११
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।।
1/10/१११
"ब्रह्म वैवर्तपुराण में राजपूतों की उत्पत्ति क्षत्रिय के द्वारा करण कन्या से बताई "🐈
करणी मिश्रित या वर्ण- संकर जाति की स्त्री होती है
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार करण जन-जाति वैश्य पुरुष और शूद्रा-कन्या से उत्पन्न है।
और करण लिखने का काम करते थे ।
ये करण ही चारण के रूप में राजवंशावली लिखते थे ।
एेसा समाज-शास्त्रीयों ने वर्णन किया है ।
तिरहुत में अब भी करण पाए जाते हैं ।
लेखन कार्य के लिए कायस्थों का एक अवान्तर भेद भी करण कहलाता है ।
करण नाम की एक आसाम, बरमा और स्याम की जंगली जन-जाति है ।
क्षत्रिय पुरुष से करण कन्या में जो पुत्र पैदा होता उसे राजपूत कहते हैं।
वैश्य पुरुष और शूद्रा कन्या से उत्पन्न हुए को करण कहते हैं ।
और ऐसी करण कन्या से क्षत्रिय के सम्बन्ध से राजपुत्र (राजपूत) पैदा हुआ।
वैसे भी राजा का वैध पुत्र राजकुमार कहलाता था राजपुत्र नहीं ।चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।
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स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड मे अध्याय २६ में
वर्णित है ।
शूद्रायां क्षत्रियादुग्र: क्रूरकर्मा: प्रजायते।
शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्राम कुशलो भवेत्।१
तया वृत्या: सजीवेद्य: शूद्र धर्मा प्रजायते ।
राजपूत इति ख्यातो युद्ध कर्म्म विशारद :।।२।
कि राजपूत क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्याओं में उत्पन्न सन्तान है
जो क्रूरकर्मा शस्त्र वृत्ति से सम्बद्ध युद्ध में कुशल होते हैं ।
ये युद्ध कर्म के जानकार और शूद्र धर्म वाले होते हैं ।
ज्वाला प्रसाद मिश्र' मुरादावादी'ने जातिभास्कर ग्रन्थ में पृष्ठ संख्या १९७ पर राजपूतों की उत्पत्ति का एेसा वर्णन किया है ।
स्मृति ग्रन्थों में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन है👇
राजपुत्र ( राजपूत)वर्णसङ्करभेदे (रजपुत) “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां राजपुत्रस्य सम्भवः”
इति( पराशरःस्मृति )
वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उत्पन्न होता है।
इसी लिए राजपूत शब्द ब्राह्मणों की दृष्टि में क्षत्रिय शब्द की अपेक्षा हेय है ।
राजपूत बारहवीं सदी के पश्चात कृत्रिम रूप से निर्मित हुआ ।
पर चारणों का वृषलत्व कम है ।
इनका व्यवसाय राजाओं ओर ब्राह्मणों का गुण वर्णन करना तथा गाना बजाना है ।
चारण लोग अपनी उत्पत्ति के संबंध में अनेक अलौकिक कथाएँ कहते हैं; कालान्तरण में एक कन्या को देवी रूप में स्वीकार कर उसे करणी माता नाम दे दिया करण या चारण का अर्थ मूलत: भ्रमणकारी होता है ।
चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।
करणी चारणों की कुल देवी है ।
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सोलहवीं सदी के, फ़ारसी भाषा में "तारीख़-ए-फ़िरिश्ता नाम से भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार, मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में लिखा है कि जब राजा,
अपनी विवाहित पत्नियों से संतुष्ट नहीं होते थे, तो अक्सर वे अपनी महिला दासियो द्वारा बच्चे पैदा करते थे, जो सिंहासन के लिए वैध रूप से जायज़ उत्तराधिकारी तो नहीं होते थे, लेकिन राजपूत या राजाओं के पुत्र कहलाते थे।[7][8]👇
सन्दर्भ देखें:- मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता की इतिहास सूची का ...
[7] "History of the rise of the Mahomedan power in India, till the year A.D. 1612: to which is added an account of the conquest, by the kings of Hydrabad, of those parts of the Madras provinces denominated the Ceded districts and northern Circars : with copious notes, Volume 1". Spottiswoode, 1829. पृ॰ xiv. अभिगमन तिथि 29 Sep 2009
[8] Mahomed Kasim Ferishta (2013). History of the Rise of the Mahomedan Power in India, Till the Year AD 1612. Briggs, John द्वारा अनूदित. Cambridge University Press. पपृ॰ 64–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-108-05554-3.
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विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा
दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं
'परन्तु कुछ सत्य अवश्य है ।
कालान्तरण में राजपूत एक संघ बन गयी
जिसमें कुछ चारण भाट तथा विदेशी जातियों का समावेश हो गया।
और रही बात आधुनिक समय में राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।
जैसे
चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।
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'परन्तु बहुतायत से चारण और भाट या भाटी बंजारों का समूह ही राजपूतों में विभाजित है ।
: 54 (10 सबसे बड़ा दिखाया गया) सभी दिखाएं
उपसमूह का नाम जनसंख्या।
नाइक 471,000
चौहान 35,000
मथुरा 32,000
सनार (anar )23,000
लबाना (abana) 19,000
मुकेरी (ukeri )16,000
हंजरा (anjra) 14,000
पंवार 14,000
बहुरूपिया ahrupi 9100
भूटिया खोला 5,900
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परिचय / इतिहास
हिंदू बंजारा, जिन्हें 53 विभिन्न नामों से जाना जाता है, मुख्य रूप से लमबाड़ी या लमानी (53%), और बंजारा (25%) बोलते हैं।
वे भारत में सबसे बड़े खानाबदोश समूह हैं और पृथ्वी के मूल रोमानी के रूप में जाने जाते हैं।
रोमनी ने सैकड़ों साल पहले भारत से यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा शुरू की, और अलग-अलग बोलियाँ उन क्षेत्रों में विकसित हुईं जिनमें प्रत्येक समूह बसता था।
बंजारा का नाम बाजिका( वाणिज्यार )शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है व्यापार या व्यवसाय, और बैंजी से, जिसका अर्थ है पैल्डलर पैक।
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कई लोग उन्हें मिस्र से निर्वासित किए गए यहूदियों के रूप में मानते हैं, क्योंकि वे मिस्र और फारस से भारत आए थे।
कुछ का मानना ​​है कि उन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा अपनी मातृभूमि से निष्कासित कर दिया गया था।
अब वे भारत के पचास प्रतिशत से अधिक जिलों में स्थित हैं।
उनका जीवन किस जैसा है?
अधिकांश भारतीय रोमानी जैतून की त्वचा, काले बाल और भूरी आँखें हैं।
हालाँकि हम आम तौर पर इन समूहों को भाग्य से रंग-बिरंगे कारवां में जगह-जगह से यात्रा करने वालों के बैंड के साथ जोड़ते हैं, लेकिन अब बंजारा के साथ ऐसा नहीं है।
ऐतिहासिक रूप से वे खानाबदोश थे और मवेशी रखते थे, नमक का कारोबार करते थे और माल का परिवहन करते थे।
अब, उनमें से अधिकांश खेती या पशु या अनाज को पालने-पोसने के लिए बस गए हैं।
अन्य अभी भी नमक और अन्य वस्तुओं का व्यापार करते हैं।
कुछ क्षेत्रों में, कुछ सफेदपोश पदों को धारण करते हैं या सरकारी कर्मचारियों के रूप में काम करते हैं।
वे चमकदार डिस्क और मोतियों के साथ जटिल कढ़ाई वाले रंगीन कपड़े भी सिलते हैं।
वे गहने और अलंकृत गहने बनाते हैं, जो महिलाएं भी पहनती हैं।
न केवल बंजारे के पास आमतौर पर एक से अधिक व्यवसाय होते हैं,।
वे समय पर समाज की जरूरतों के आधार पर, अपनी आय को पूरक करने के लिए अतिरिक्त कौशल का भी उपयोग करते हैं।
कुछ लोग झाड़ू, लोहे के औजार और सुई जैसी वस्तुएं बनाने में माहिर हैं।
वे उपकरणों की मरम्मत भी कर सकते हैं या पत्थर के साथ काम कर सकते हैं।
दूसरों का मानना ​​है कि किसी को "धार्मिक भीख" से जीवन यापन के लिए काम नहीं करना पड़ता है।
वे विशिष्ट देवता के नाम पर भीख माँगते हुए विशेष श्रृंगार में गाते और पहनते हैं।
बंजारा को संगीत पसंद है, लोक वाद्य बजाना और नृत्य करना। बंजार भी कलाबाज, जादूगर, चालबाज, कहानीकार और भाग्य बताने वाले हैं।
क्योंकि वे गरीब हैं, वे डेयरी उत्पादों के साथ अपने बागानों में उगाए गए खाद्य पदार्थ खाते हैं।
कई घास की झोपड़ियों में रहते हैं, अक्सर विस्तारित परिवारों के साथ।
अन्य जातियों के साथ न्यूनतम संबंध रखने वाले बंजारा परिवार घनिष्ठ हैं।
समुदाय के नेता की भूमिका नेता के बेटे को दी जाती है।
सभी जैविक पुत्रों को पैतृक संपत्ति से बराबर हिस्सा मिलता है।
विवाह की व्यवस्था की जा सकती है, खासकर तीन पीढ़ियों के रिश्तेदारों के मिलन से बचने के लिए।
कुछ समूहों में, हालांकि, बहिन से चचेरे भाई को शादी करने की अनुमति है।
दहेज 20,000 रुपये या लगभग $ 450.00 के रूप में उच्च हो सकता है।
शादीशुदा महिलाएं हाथी दांत की मेहंदी लगाती हैं।
उनके विश्वास क्या हैं?
बंजारा बहुसंख्यक हिंदू हैं; कुछ ने हिंदू प्रथाओं को अपनी खुद की एनिमेटिड मान्यताओं के साथ जोड़ दिया है।
अन्य समूह इस्लाम का पालन करते हैं; अभी तक अन्य सिख हैं।
रोमानी अक्सर लोक मान्यताओं का पालन करते हैं, और इन धार्मिक मान्यताओं के साथ मिश्रित कई वर्जनाएं हैं (चीजें जो कभी नहीं करनी चाहिए।)
एक हिंदू वर्जना यह है कि एक महिला के बालों को कंघी नहीं करना चाहिए या पुरुषों की उपस्थिति में लंबे समय तक नीचे नहीं रहना चाहिए।
एक और बात यह है कि एक महिला को बैठे हुए पुरुष के सामने से नहीं गुजरना चाहिए, बल्कि उसके पीछे होना चाहिए।
भले ही रोमानी भाषण में अनारक्षित हैं, कई में उच्च नैतिक मानक हैं।
उदाहरण के लिए, शुद्धता बहुत महत्वपूर्ण है।
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कुल या वंश की उच्चता का निर्धारण व्यक्तियों के संस्कार और व्यवहार से ही किया जाता है ।
श्रेष्ठ वंश में श्रेष्ठ सन्तानें का ही प्रादुर्भाव होता है ।
दोगले और गाँलि- गलोज करने वाले और अय्याश लोग नि: सन्देह अवैध यौनाचारों से उत्पन्न होते हैं ।
भले हीं वे स्वयं को समाज में अपने ही मुख से ऊँचा आँकते हों ।
जिनके पास कुतर्क ,गाली और भौंकने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता !
जिनमें न क्षमा होती है; और न क्षमता ही ।
वह लोग धैर्य हीन बन्दर के समान चंचल व
लंगोटी से कच्चे होते हैं ।
और बात बात पर गीदड़ धमकी कभी पुलिस की तो कभी कोर्ट की और गालियाँ तो जिनका वाणी का श्रृँगार होती हैं।
जिनमें मिथ्या अहं और मुर्दों जैसी अकड़ ही होती है ।
ज्ञान के नाम पर रूढ़िवादी पुरोहितों से सुनी सुनायीं किंवदन्तियाँ ही प्रमाण होती हैं ।
'परन्तु पौराणिक या वैदिक कोई साक्ष्य जिनके पास नहीं होता ।
अहीरों को द्वेष वश गालियाँ देने वाले कुछ चारण बंजारे और माली जन-जाति के लोग इसका प्रबल प्रमाण हैं ।
ये वास्तविक रूप में अवैध संताने हैं , उन दासी पुत्रों से और क्या अपेक्षा की जा सकती है ?
कुलहीन, संस्कारहीन मनुष्य से अच्छे तो जानवर है .
विदित हो कि अपनी फेस बुक या ब्लोगर आइडी पर अहीरों को निरन्तर गाली या उनके इतिहास की गलत तरीके से ऐडिटिंग करने वाले ..
ये भाटी भाट या चारण बंजारे का एक समुदाय है ।
जादौन - ये बंजारा समुदाय हैऔर भारत में आने से पहले अफगानिस्तान में जादून/ गादूँन पठान थे
भारत में बीकानेर और जैसलमैर में जादौन बंजारे हैं ।
आधुनिक समाज शास्त्री यों ने इन्हें छोटी राठौड़ों समुदाय के अन्तर्गत चिन्हित किया है ।
इन्हीं के समानान्तरण जाडेजा हैं
जाड़ेज़ा - जाम उनार बिन बबिनाह नाम के मुसलिमों के वंशज हैं ये लोग जो ठीक से हिन्दु भी नहीं हैं इनका जाम जाड़ा भी मुसलिमों से सम्बद्ध था ।
और सैनी - ये माली लोग इनकी हैसियत सिर्फ़ पेड़ पौधों को पानी देने की है .
आज ये शूरसेन से सम्बद्ध होने का प्रयास कर रहे हैं।
विदित हो कि कायस्थों में सैनी और शक्सैनी वे लोग थे; जिन्होंने शक और सीथियनों की सैना में नौकरी की ..
अब य भी स्वयं को राजपूत लिखते हैं ।
ये ख़ुद को मालिया राजपूत कहते हैं ; सैना में काम करने कारण ये सैनिक से सैनी उपनाम लगाने लगे .
और अब सैनी स्वयं को शूरसेन से जोड़ रहे है।
विदित हो की सिसौदिया आदि राजपूत इन्हें कम ही स्वीकार करते हैं।
जादौन जन-जाति का यदुवंश से प्रत्यक्ष कोई सम्बन्ध नहीं है ।
अफगानिस्तान के गादौन जादौन पठान जो वनी इज़राएल या यहूदियों की स्वयं को शाखा मानते हैं
उसी के आधार पर ये भी अपने को यदुवंशी मानने की बात करते हैं ।
जबकि समस्त यदुवंशज स्वयं को गोप अथवा यादव ही मानते थे ।
इस आधार पर कल को कोई वसुदेव सैनी भी लिखा सकता है ।
सूरसैनी नाम ये प्राचीनत्तम ग्रन्थों में किसी यदुवंशी का विवरण नहीं है ।
-सूर सैन के किसी वंशज 'ने भी यह विशेषण कभी अपने नाम के पश्चात नहीं लगाया ।
केवल यादव गोप और घोष विशेषण ही रूढ़ रहे
आभीर शब्द तो आर्य्य का ही रूपान्तरण है ।
आर्य्य शब्द का प्रयोग 'न करके भारतीय पुरोहित वर्ग 'ने आभीर शब्द का प्रयोग यादवों या गोपों को ईसा० पूर्व द्वत्तीय सदी के समकालिक किया था ।
जो परवर्ती प्राकृत अपभ्रंश और हिन्दी भाषाओं में आहिर अहीर ,अहर आदि रूपान्तरण में प्रकाशिका हुआ ।
पोस्ट - योगेश राठी जी की क़लम से





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