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Sunday, 6 October 2024

राजपूतों की उत्पत्ति,राजपूताना,राजपूत ,राजपूतसमाज,राजपूतानापरिवार

मृगमायनी नाम की कोई गुर्जर महिला नहीं थी।
झूठा प्रचार करके एक काल्पनिक कहानी घडी गई।
*हरिहरनिवास दिवेदी की किताब ग्वालियर के तोमर के पेज 134 पर स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है की मान सिंह तोमर और मृगनयनी की कहानी एक जनश्रुति ( अफ़वाह ) है। ऐसा कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य या प्रमाण नहीं मिलता जिससे ये पता की राजा मान सिंह तोमर की कोई मृगनयनी नाम की रानी थी। मृगनयनी के बारे में किसी भी समकालीन कवि ने भी नहीं लिखा है इसलिए ये सिर्फ काल्पनिक बात है।*
सबसे पहले 1950 ईसवी में वृन्दावन लाल वर्मा ने मृगनयनी नाम का उपन्यास लिखा उससे पहले मृगनयनी नाम कहीं नहीं लिखा है ना किसी ऐतिहासिक साक्ष्य में और ना ही कहीं समकालीन साहित्य में। मृगनयनी की कहानी मात्र एक जनश्रुति ( अफ़वाह ) है।
*जिस प्रकार हिसार के गुर्जर महल को झूठी कहानी बनाकर गुजरी महल बता कर के प्रचारित करा गया जबकि सच्चाई यह है कि फिरोज़ शाह तुगलक की मां भाटी राजपूत थी और उसकी प्रेमिका जो बाद में उसकी पत्नी बनी टांक राजपूत थी । ग्वालियर का गुजरी महल असल में गुर्जर महल है ये ग्वालियर का किला गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज ने अपने शासनकाल में बनवाया था । अगर इस किले की पोटेशियम आर्गन डेटिंग की जाए तो सच्चाई दुनिया के सामने आ जाएगी की ये किला कितना पुराना है और ये कब बना । ग्वालियर के किले पर बना चतुर्भुज मंदिर तेली का मंदिर दोनों गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल में बनवाए गए और गुर्जर प्रतिहार वास्तुकला के जीते जागते उदाहरण है । पहले किला या घर बनवाया जाता है उसके बाद उसके अंदर मंदिर बनवाया जाता है । हिसार के गुर्जर महल की तरह ही ग्वालियर के गुर्जर महल को गुजरी महल बता कर के झूठ फैलाया गया।*
*1232 ईसवी से ही ग्वालियर दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा। दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा ग्वालियर क्षेत्र को अपने अधीन करने के बाद ग्वालियर के आसपास राजपूत तोमरों का उदय हुआ। 14वीं शताब्दी में, उन्होंने दिल्ली के तुगलक शासकों के सामंतों के रूप में कार्य किया। उन्होंने एक जागीर रखी, जो अब मुरैना जिले में अंबा के पास एक गाँव है। उन्होंने 1380 तक फिरोज शाह तुगलक को सैन्य सेवा प्रदान की। 1451 ईसवी में दिल्ली सल्तनत पर बहलोल लोदी का अधिकार हो गया और उसने 1489 ईसवी तक राज किया ।*
1486 ईसवी में जब मान सिंह तोमर ग्वालियर का राजा बना तो दिल्ली सल्तनत के बहलोल लोदी ने उसपर आक्रमण कर दिया उस समय मान सिंह तोमर ने बहलोल लोदी को 800,000 टंकों (सिक्कों) की श्रद्धांजलि देकर युद्ध से बचने का फैसला किया। 1500 ईसवी में जब बहलोल लोदी का बेटा सिकंदर लोदी (निज़ाम खान ) सुल्तान था तो मान सिंह तोमर ने अपने बेटे विक्रमादित्य तोमर राजपूत के हाथो बयाना में सिकंदर लोदी के पास उपहार पहुंचाए थे जिससे की वो ग्वालियर पर आक्रमण ना करे। सिकंदर लोदी ने नरवर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया जिससे की मेवाड़ से मान सिंह तोमर को कोई मदद ना मिल सके और उसने उस क्षेत्र पर राज सिंह कछवाहा राजपूत को अपना जागीरदार बना दिया।
*1517 ईसवी में दिल्ली सल्तनत पर सिकंदर लोदी का बेटा इब्राहिम लोदी सुलतान बना 1523 ईसवी में उसने ग्वालियर पर धावा बोल दिया उस समय ग्वालियर पर मान सिंह तोमर का बेटा विक्रमादित्य राजा था। राजपूत राजा विक्रमादित्य तोमर ने इब्राहिम लोदी से संधि कर ली एवं उसको 7 मन सोना (280 किलो सोना ) , श्याम सुन्दर हाथी और अपनी पुत्री (बेटी) सुलतान इब्राहिम लोदी को देना स्वीकार किया। इब्राहिम लोदी ने विक्रमादित्य तोमर के सामने ये भी शर्त रखी की ग्वालियर का गढ़ छोड़ दो और शमशाबाद की जागीर लेलो। इब्राहिम लोदी ने विक्रमादित्य तोमर को साथ में धन संपत्ति और रनिवास ले जाने की अनुमति दे दी।*
*20 अप्रैल 1526 ईसवी को पानीपत की लड़ाई में बाबर से लड़ते हुए दामाद इब्राहिम लोदी और उसके ससुर विक्रमादित्य तोमर की मृत्यु हो गई।*
हम कुछ किताबो के पन्ने साथ में दे रहे है और ये सब इतिहास आप विस्तार से इन किताबो में पढ़ सकते हो
*ग्वालियर के तोमर - लेखक - हरिहर निवास दिवेदी - पेज नंबर 134 से 178*
*Twilight of the Sultanate: A Political, Social and Cultural History of the Sultanate of Delhi from the Invasion of Timur to the Conquest of Babur 1398-1526 - Writer -Kishori Saran Lal - Page No - 155 से 206*
*तारिक़ ऐ फरिश्ता पेज नंबर 568*
Post sabhar डॉ सुनील गुर्जर #gurjarsamratmihirbhoj #Rajput #Gurjar #history #HiddenTruths #Gwalior

हिन्दू जाति का उत्थान और पतन पंडित रजनीकांत शास्त्री

 हिन्दू जाति का उत्थान और पतन पंडित रजनीकांत शास्त्री द्वारा लिखित ये किताब एक जाति विशेष को अपने बारे में जानने के लिए पढना चाहिए जिससे दूसरी अन्य मार्शल जातियों का इतिहास न चुराए।

डॉ सुनील गुर्जर

राजपूतों की उत्पत्ति

 राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे इतिहास में कई मत प्रचलित हैं।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजपूत संस्कृत के राजपुत्र शब्द का अपभ्रंश है;राजपुत्र शब्द हिन्दू धर्म ग्रंथों में कई स्थानों पर देखने को मिल जायेगा लेकिन वह जातिसूचक के रूप में नही होता अपितु संबोधन सूचक शब्द के रूप में होता है इसके लिये ज्योतिषाचार्य श्री रजनीकांत शास्त्री जी बताते हैं कि हिंदू धर्म ग्रंथों में राजपुत्र शब्द अवश्य आया है पर किसी जाति विशेष के अर्थ में नहीं; बल्कि राजकुमार के अर्थ में...
लेकिन थोड़ा अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि पुराणों में एक स्थान पर राजपुत्र जातिसूचक शब्द के रूप में आया है जो कि इस प्रकार है-
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।।
~ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः १ (ब्रह्मखण्डः)/अध्यायः १०/श्लोकः ११०
भावार्थ:- क्षत्रिय से करण-कन्या(वैश्य पुरुष और शूद्र कन्या से उतपन्न) में राजपुत्र और राजपुत्र की कन्या में करण द्वारा 'आगरी' उतपन्न हुआ।
राजपुत्र के क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या के गर्भ में उतपन्न होने का वर्णन शब्दकपद्रुम में भी आया है- "करणकन्यायां क्षत्त्रियाज्जातश्च । इति पुराणम् ॥"
अर्थात:- क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या में उतपन्न संतान...
सूर्यवंशी इंद्रजीत प्रतिहार गुर्जर

राजपूत

 राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे इतिहास में कई मत प्रचलित हैं।

थोड़ा अध्ययन करने के बाद ये रजपूत शब्द हमें स्कंद पुराण में देखने को मिलता है जो कि इस प्रकार है-
शूद्रायां क्षत्रियादुग्रः क्रूरकर्मा प्रजायते।।४७।।
शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्रामकुशलो भवेत्।
तया वृत्त्या स जीवेद्यो शूद्रधर्मा प्रजायते।।४८।।
रजपूत इति ख्यातो युद्धकर्मविशारदः।
~स्कन्दपुराण- आदिरहस्य सह्याद्रि खण्ड- व्यास देव व सनत्कुमार का संकर जाति विषयक संवाद नामक २६ वाँ अध्याय-श्लोक संख्या ४७,४८,४९
भावार्थ:-क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है ।
कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है...
लेकिन अमरकोष में राजपूत और क्षत्रिय शब्द को परस्पर पर्यायवाची नही बतलाया है;स्वयं देखें-
मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो क्षत्रियो बाहुजो विराट्।
राजा राट् पार्थिवक्ष्मा भृन्नृपभूपमहीक्षित:।।
~अमरकोष
अर्थात:- मूर्धाभिषिक्त,राजन्य,बाहुज,क्षत्रिय,विराट्,राजा,राट्,पार्थिव,क्ष्माभृत्,नृप,भूप,और महिक्षित ये क्षत्रिय शब्द के पर्याय है।
इसमें 'राजपूत' शब्द या तदर्थक कोई अन्य शब्द नहीं आया है।
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 पुराणों के निम्न श्लोक को पढ़ें-

सद्यः क्षत्रियबीजेन राजपुत्रस्य योषिति।
बभूव तीवरश्चैव पतितो जारदोषतः।।
~ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः १ (ब्रह्मखण्डः)/अध्यायः १०/श्लोकः ९९
भावार्थ:-क्षत्रिय के बीज से राजपुत्र की स्त्री में तीवर उतपन्न हुआ।वह भी व्याभिचार दोष के कारण पतित कहलाया।
यदि क्षत्रिय और राजपूत परस्पर पर्यायवाची शब्द होते तो क्षत्रिय पुरुष और राजपूत स्त्री की संतान राजपूत या क्षत्रिय ही होती न कि तीवर या धीवर!!
इसके अतिरिक्त शब्दकल्पद्रुम में राजपुत्र को वर्णसंकर जाति लिखा है जबकि क्षत्रिय वर्णसंकर नही...
Manohar Laxman varadpande(1987). History of Indian theatre: classical theatre. Abhinav Publication. Page number 290
"The word kshatriya is not synonyms with Rajput."
अर्थात- क्षत्रिय शब्द राजपूत का पर्यायवाची नही है।
कालका रंजन जी ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारताचा इतिहास के हर्षोत्तर उत्तर भारत नामक विषय के प्रष्ठ संख्या ३३४ में राजपूत और वैदिक क्षत्रिय भिन्न भिन्न बतलाये हैं।
वैदिक क्षत्रियों द्वारा पशुपालन करने का उल्लेख धर्म ग्रंथों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है जबकि राजपूत जाति पशुपालन को अत्यंत घृणित दृष्टि से देखती है और पशुपालन के प्रति संकुचित मानसिकता रखती है...
महाभारत में जरासंध पुत्र सहदेव द्वारा गाय भैंस भेड़ बकरी को युधिष्ठिर को भेंट करने का उल्लेख मिलता है;युधिष्ठिर जो कि एक क्षत्रिय थे पशु पालन करते होंगे तभी कोई भेंट में पशु देगा-
सहदेव उवाच।
इमे रत्नानि भूरिणी गोजाविमहिषादयः।।
हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानि च।
दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यते भवान्।।
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महाभारतम्/ सभापर्व(जरासंध वध पर्व)/अध्याय: २४/ श्लोक: ४१

 महाभारतम्/ सभापर्व(जरासंध वध पर्व)/अध्याय: २४/ श्लोक: ४१

सहदेव ने कहा- प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़-बकरे आदि पशु, बहुत से रत्न, हथी-घोड़े और नाना प्रकार के वस्त्र आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिर को दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझे सेवा के लिये आदेश दीजिये।।
इसके अतिरिक्त कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता ७/१/४/९ में क्षत्रिय को भेड़ पालने के लिए कहा गया है
कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत एक संघ है
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है-

प्रारंभिक मध्ययुगीन साहित्य

 Brajadulal Chattopadhyay 1994; page number 60-

प्रारंभिक मध्ययुगीन साहित्य बताता है कि इस नवगठित राजपूत में कई जातियों के लोग शामिल थे।
भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने इस ऐतिहासिक तथ्य का पूर्णतः पता लगा लिया है कि जिस काल में इस जाति का भारत के राजनैतिक क्षेत्र में पदार्पण हुआ था,उस काल में यह एक नवागन्तुक जाति समझती जाती थी।
बंगाल के अद्वितीय विद्वान स्वर्गीय श्री रमेशचंद्र दत्त महोदय अपने Civilization in Ancient India नामक प्रसिद्ध ग्रंथ के भाग-२ , प्रष्ठ १६४ में लिखते है-
आठवीं शताब्दी के पूर्व राजपूत जाति हिंदू आर्य नहीं समझी जाती थी।देश के साहित्य तथा विदेशी पर्यटकों के भृमण वृत्तान्तों में उनके नाम का उल्लेख हम लोगों को नहीं मिलता और न उनकी किसी पूर्व संस्कृति के चिन्ह देखने में आते हैं।डॉक्टर एच० एच० विल्सन् ने यह निर्णय किया है कि ये(राजपूत)उन शक आदि विदेशियों के वंशधर है जो विक्रमादित्य से पहले,सदियों तक भारत में झुंड के झुंड आये थे।
विदेशी जातियां शीघ्र ही हिंदू बन गयी।वे जातियाँ अथवा कुटुम्ब जो शासक पद को प्राप्त करने में सफल हुए हिंदुओं की राज्यशासन पद्धति में क्षत्रिय बनकर तुरन्त प्रवेश कर गए।इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर के परिहार तथा अनेक अन्य राजपूत जातियों का विकास उन बर्बर विदेशियों से हुआ है, जिनकी बाढ़ पाँचवीं तथा छठी शताब्दीयों में भारत में आई थी।

Early History of India including Alexander's Compaigns

 इतिहास-विशारद स्मिथ साहब अपने Early History of India including Alexander's Compaigns, second edition,page no. 303 and 304 में लिखते हैं-

आगे दक्षिण की ओर से बहुत सी आदिम अनार्य जातियों ने भी हिन्दू बनकर यही सामाजिक उन्नति प्राप्त कर ली,जिसके प्रभाव से सूर्य और चंद्र के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाली वंशावलियों से सुसज्जित होकर गोड़, भर,खरवार आदि क्रमशः चन्देल, राठौर,गहरवार तथा अन्य राजपूत जातियाँ बनकर निकल पड़े।
इसके अतिरिक्त स्मिथ साहब अपने The Oxford student's history of India, Eighth Edition, page number 91 and 92 में लिखते हैं-
उदाहरण के लिए अवध की प्रसिद्ध राजपूत जाति जैसों को लीजिये।ये भरों के समीपी सम्बन्धी अथवा अन्य इन्हीं की संतान हैं।आजकल इन भरों की प्रतिनिधि, अति ही नीची श्रेणी की एक बहुसंख्यक जाति है।
जस्टिस कैम्पबेल साहब ने लिखा है कि प्राचीन-काल की रीति-रिवाजों (आर्यों की) को मानने वाले जाट, नवीन हिन्दू-धर्म के रिवाजों को मानने पर राजपूत हैं। जाटों से राजपूत बने हैं न कि राजपूतों से जाट।
जबकि स्व० प्रसिद्ध इतिहासकार शूरवीर पँवार ने अपने एक शोध आलेख में गुर्जरों को राजपूतों का पूर्वज माना है।

तारीक ऐ फरिश्ता

 मुहम्मद कासिम फरिश्ता ने भी राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में फ़ारसी में अपनी पुस्तक

"तारीक ऐ फरिश्ता" में अपना मत प्रस्तुत किया है इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया Lt Colonel John Briggs ने जो मद्रास आर्मी में थे, किताब के पहले वॉल्यूम ( Volume - 1 ) के Introductory Chapter On The Hindoos में पेज नंबर 15 पर लिखा है-
The origion of Rajpoots is thus related The rajas not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves who although not legitimate successors to the throne ,were Rajpoots or the children of the rajas
अर्थात:- राजा अपनी पत्नियों से संतुष्ट नहीं थे, उनकी महिला दासियो द्वारा अक्सर बच्चे होते थे, जो सिंहासन के लिए वैध उत्तराधिकारी नहीं थे, लेकिन इनको राजपूत या राजा के बच्चे या राज पुत्र कहा जाता था ।

A Short History Of Muslim Rule In India

 प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद जी ने अपनी पुस्तक

"A Short History Of Muslim Rule In India" के पेज नंबर 19 पर बताया है की राजपुताना में किसको बोला जाता है राजपूत-
The word Rajput in comman paralance,in certain states of Rajputana is used to denote the illegitimate sons of a Ksatriya chief or a jagirdar.
अर्थात:-राजपुताना के कुछ राज्यों में आम बोल चाल में राजपूत शब्द का प्रयोग एक क्षत्रिय मुखिया या जागीरदार के नाजायज बेटों को सम्बोधित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

Ancient India

 विद्याधर महाजन जी ने अपनी पुस्तक "Ancient India" जो की 1960 से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई जा रही है , के पेज 479 पर लिखा है:-

The word Rajput is used in certain parts of Rajasthan to denote the illegitimate sons of a Kshatriya Chief ar Jagirdar. अर्थात:- राजपूत शब्द राजस्थान के कुछ हिस्सों में एक क्षत्रिय प्रमुख या जागीरदार के नाजायज बेटों को निरूपित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

History of Rise of Mohammadan power in India, volume 1, chapter 8

 History of Rise of Mohammadan power in India, volume 1, chapter 8

The Rajas, not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves, who, although not legitimate successors to the throne,were styled rajpoots, or the children of the rajas. The muslim Invaders took full advantage of this realy bad and immoral practice popular among indian kings, to find a good alley among hindoos and to also satisfy their own lust and appointed those son of kings as their Governors.
During mugal period this community became so powerful that they started abusing their own people motherland.

History of Rajsthan book "He was son of king but not from the queen."

 History of Rajsthan book "He was son of king but not from the queen."

राजस्थान का इतिहास भाग-1:-गोला का अर्थ दास अथवा गुलाम होता है। भीषण दुर्भिक्षों के कारण राजस्थान में गुलामों की उत्पत्ति हुई थी। इन अकालों के दिनों में हजारों की संख्या में मनुष्य बाजारों में दास बनाकर बेचे जाते थे। पहाड़ों पर रहने वाली पिंडारी और दूसरी जंगली जातियों के अत्याचार बहुत दिनों तक चलते रहे और उन्हीं जातियों के लोगों के द्वारा बाजारों में दासों की बिक्री होती थी, वे लोग असहाय राजपूतों को पकड़कर अपने यहाँ ले जाते थे और उसके बाद बाजारों में उनको बेच आते थे। इस प्रकार जो निर्धन और असहाय राजपूत खरीदे और वेचे जाते थे, उनकी संख्या राजस्थान में बहुत अधिक हो गयी थी और उन लोगों की जो संतान पैदा होती थी, वह गोला के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन गुलाम राजपूतों को गोला और उनकी स्त्रियों तथा लड़कियों को गोली कहा जाता था।
इन गोला लोगों में राजपूत, मुसलमान और अनेक दूसरी जातियों के लोग पाये जाते हैं। बाजारों में उन सबका क्रय और विक्रय होता है। बहुत से राजपूत सामन्त इन गोला लोगों की अच्छी लड़कियों को अपनी उपपत्नी बना लेते हैं और उनसे जो लड़के पैदा होते हैं, वे सामन्तों के राज्य में अच्छे पदों पर काम करने हेतु नियुक्त कर दिये जाते हैं। देवगढ़ का स्वर्गीय सामन्त जब उदयपुर राजधानी में आया करता था तो उसके साथ तीन सौ अश्वारोही गोला सैनिक आया करते थे। उन सैनिकों के बायें हाथ एक-एक साने का कडा होता था
जैसा कि राजस्थान का इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है कि इन्हें अच्छे पदों पर काम करने के हेतु नियुक्त किया जाता था और history of Rise of Mohammadan में भी लिखा कि मुगल काल में ये शक्तिशाली होने लगे तब इन्होंने सत्ता के लिए लड़ना प्रारम्भ कर दिया जैसा कि ऐतिहासिक ग्रंथो में ऐसे राजाओं के प्रमाण मिल जायेंगे जो जीवन भर सत्ता के लिए लड़ते रहे
जैसा कि कर्नल टॉड की किताब राजस्थान का इतिहास में कन्नौज और अनहिलवाडा के राजाओं ने सत्ता के लिए पृथ्वीराज चौहान को शक्तिहीन करने के लिए गजनी के शाहबुद्दीन को आमंत्रित किया!!
और अजीत सिंह ने सत्ता के लिए राजा दुर्गादास राठौर को राज्य से निष्कासित करवा दिया।
राणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने सत्ता के लिए विक्रमादित्य की हत्या करवाई...
इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा की एक पुस्तक में प्रताप सिंह द्वारा सत्ता के लिए जगपाल को मारने का उल्लेख मिलता है।
पृथ्वीराज उड़ाना और राणा सांगा के मध्य सत्ता के लिए खुनी झगड़ा होने का ऐतिहासिक पुस्तको में जिक्र मिलता है और इसी झगड़े में राणा सांगा अपनी एक आँख और हाथ खो देते है और पृथ्वीराज उड़ाना को मरवा देते है।
कैसे सत्ता के लिए राजकुमार रणमल राठौर राणा मोकल को रेकय से निकलवा देता है और राणा राघव देव की हत्या करवा देता है!!
ऐसे करके ये सत्ता में बने रहे और इनकी वित्तीय स्थिति काफी मजबूत हो गयी...
वित्तमेव कलौ नृणां जन्माचारगुणोदयः। धर्मन्यायव्यवस्थायां कारणं बलमेव हि।।
~श्रीमद्भागवत महापुराण द्वादश स्कन्ध द्वितीय अध्याय श्लोक संख्या २
भावार्थ:-कलयुग में जिसके पास धन होगा,उसी को लोग कुलीन,सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे।जिसके हाथ में शक्ति होगी वही धर्म और न्याय की व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा।

1857 की जनक्रांति

  1857 की जनक्रांति के जनक कोतवाल धनसिंह गुर्जर पर इतिहास लेखन: (डॉ सुशील भाटी) 10 मई 1857 को मेरठ से, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में, शु...